दिल्ली के कब्रिस्तान की / 45 एकड़ में से 5 बीघा कोरोना के लिए अलग किया, इसका 75% हिस्सा भर चुका है, 300 को तो शमीम दफना चुके हैं

कहानी दिल्ली के कब्रिस्तान की / 45 एकड़ में से 5 बीघा कोरोना के लिए अलग किया, इसका 75% हिस्सा भर चुका है, 300 को तो शमीम दफना चुके हैं

मोहम्मद शमीम बीते ढाई महीने से लगातार कोरोना से मरने वालों को दफनाने का काम कर रहे हैं। इस दौरान उन्हें एक दिन की भी छुट्टी नहीं मिली है। वे बताते हैं, ‘शनिवार-रविवार तो छोड़िए, ईद के दिन भी मैंने तीन शव दफनाए हैं।मोहम्मद शमीम बीते ढाई महीने से लगातार कोरोना से मरने वालों को दफनाने का काम कर रहे हैं। इस दौरान उन्हें एक दिन की भी छुट्टी नहीं मिली है। वे बताते हैं, ‘शनिवार-रविवार तो छोड़िए, ईद के दिन भी मैंने तीन शव दफनाए हैं।

  • ढाई महीने में जदीद कब्रिस्तान’ में सबसे ज्यादा कोरोना मरीजों की लाश पहुंची है, यहां अमूमन पुरानी दिल्ली के निवासियों को ही दफनाया जाता रहा है
  • शमीम ने 25 दिन पहले खुद कोरोना टेस्ट करवाया, 4500 रुपए अपनी जेब से दिए, एक शव के सिर्फ सौ रुपए मिलते हैं और इससे ज़्यादा तो ग्लव्ज, सैनिटाइजर में ही लग जाते हैं

राहुल कोटियाल

राहुल कोटियाल

Jun 15, 2020, 05:54 AM IST

नई दिल्ली. ‘मोहम्मद शमीम लोगों की कब्र खोदते हैं।’ यह वाक्य बेहद क्रूर लगता है, लेकिन यही शमीम की जिंदगी की हकीकत है। ऐसी हकीकत जिसे कोरोना महामारी ने और भी ज्यादा क्रूर बना दिया है। ऐसे समय में जब लोग कोरोना से मरने वाले परिजनों के शवों को छूने से भी घबरा रहे हैं, शमीम बीते ढाई महीने से लगातार इन शवों को दफनाने में जुटे हुए हैं।

शमीम दिल्ली के ‘जदीद कब्रिस्तान अहले इस्लाम’ में कब्र खोदने का काम करते हैं। आईटीओ के पास स्थित ये वही कब्रिस्तान है, जहां कोरोना संक्रमण से मरने वाले सबसे ज्यादा लोगों को दफनाया गया है।

शमीम बताते हैं, ‘शुरुआत में तो हमने भी कोरोना से मरने वालों को यहां दफनाने से इनकार कर दिया था। हमें भी संक्रमण का डर था। लेकिन फिर डॉक्टरों ने हमें समझाया और कब्रिस्तान की समिति वालों ने भी सोचा कि अगर कोई भी इन लोगों को दफनाने को तैयार नहीं हुआ तो ऐसे लोगों का क्या होगा? किसी को तो ये जिम्मेदारी लेनी ही थी तो हम तैयार हो गए।’

मोहम्मद शमीम ही वह व्यक्ति हैं, जिन्होंने दिल्ली में सबसे पहले कोरोना से मरने वाले लोगों के शव दफनाने की जिम्मेदारी ली थी। लॉकडाउन के दो दिन बाद से ही उन्होंने यह काम शुरू कर दिया था और अब तक 300 से ज्यादा शवों को दफन कर चुके हैं।

शमीम बताते हैं कि कोरोना संक्रमण से होने वाली मौतों के लिए पांच बीघा जमीन का करीब 75% हिस्सा अब भर चुका है।

‘जदीद कब्रिस्तान अहले इस्लाम’ करीब 45 एकड़ में फैला है। इसमें से करीब पांच बीघा जमीन कोरोना संक्रमण से होने वाली मौतों के अलग की गई है। शमीम बताते हैं, ‘इस पांच बीघा जमीन का करीब 75 फीसदी हिस्सा अब तक भर चुका है। जिस तेजी से लोगों की मौत हो रही हैं, एक हफ्ते के भीतर ही बाकी जगह भी पूरी भर जाएगी। तब कब्रिस्तान की समिति को शायद और जमीन कोरोना वाले शवों के लिए देनी पड़े। इसके लिए फिर से कई पेड़ काट कर जमीन तैयार करनी होगी। यह पांच बीघा जमीन भी जंगल काटकर ही तैयार की गई थी।’

शमीम बताते हैं कि लॉकडाउन खुलने के बाद क्रबिस्तान आने वाले शवों की संख्या बढ़ी है। अब रोज 12 से 15 शव आ रहे हैं। 

शमीम बताते हैं कि लॉकडाउन खुलने के साथ ही कोरोना से मरने वालों की संख्या में अचानक तेजी आई है। उनके अनुसार जहां लॉकडाउन के दौरान एक दिन में पांच-छह शव इस कब्रिस्तान में पहुंच रहे थे वहीं लॉकडाउन खुलने के साथ ही रोजाना 12 से 15 शव आने लगे हैं। यही नहीं, अन्य वजहों से मरने वाले लोगों के शव भी इन दिनों ज्यादा आने लगे हैं।

शमीम कहते हैं, ‘कोरोना की बहस के चलते ऐसी मौतों पर किसी का ध्यान नहीं है, लेकिन इनमें भी बहुत बढ़ोतरी हुई है। औसतन यहां 6-7 शव आया करते थे, लेकिन इन दिनों कोरोना से अलग भी 10-12 शव रोज आ रहे हैं। इसका कारण शायद यही है कि कोरोना महामारी के चलते लोगों को अन्य गम्भीर बीमारियों का भी अच्छा इलाज नहीं मिल पा रहा है।’

इस कब्रिस्तान में अमूमन पुरानी दिल्ली के निवासियों को दफनाया जाता रहा है। लेकिन कोरोना महामारी के दौर में दिल्ली के कई अलग-अलग हिस्सों से शव यहां लाए जा रहे हैं। इनमें कई शव तो ऐसे भी हैं जिन्हें मौत के चार-पांच दिन बाद यहां लाया जा रहा है। यह देरी कोरोना जांच की रिपोर्ट के इंतजार में हो रही है।

मोहम्मद शमीम बताते हैं कि कई शव पांच-पांच दिन पुराने आ रहे हैं। उन शवों से इतनी बदबू आती है कि उसके नजदीक खड़ा रहना भी मुश्किल होता है। 

इन दिनों अस्पतालों में मरने वाले सभी लोगों की कोरोना जांच हो रही है। इस जांच की रिपोर्ट कई बार चार-पांच दिन के बाद मिल रही है। ऐसे में अस्पताल प्रशासन मृतक के परिजनों को दो विकल्प दे रहे हैं। पहला, वे रिपोर्ट का इंतजार करें और रिपोर्ट आने के बाद ही शव को ले जाएं। दूसरा, वे शव को ‘कोरोना संदिग्ध’ मानकर ले जाएं और उसका अंतिम संस्कार अस्पताल प्रशासन की निगरानी में कोरोना संक्रमण से होने वाले मौत की तरह ही किया जाए। इस दूसरे विकल्प से बचने के लिए कई लोग रिपोर्ट का इंतजार कर रहे हैं और ऐसे में शव पांच-पांच दिन बाद कब्रिस्तान पहुंच रहे हैं।

मोहम्मद शमीम बीते ढाई महीनों से लगातार कोरोना से मरने वालों को दफनाने का काम कर रहे हैं। इस दौरान उन्हें एक दिन की भी छुट्टी नहीं मिली है।

मोहम्मद शमीम कहते हैं, ‘कल ही यहां एक शव आया जो पांच दिन पुराना था। उस शव से इतनी बदबू आ रही थी कि उसके नजदीक खड़ा रहना भी मुश्किल हो रहा था। फिर भी हमने उस मय्यत को दफन किया। हम करेंगे, हमारा काम ही यही है। तीन पीढ़ियों से यही काम करते आ रहे हैं। लेकिन दुख इस बात का है कि इसमें हमें सरकार की ओर से कोई समर्थन नहीं मिल रहा। हम अपनी जान जोखिम में डालकर इन दिनों ये काम कर रहे हैं लेकिन हमारा ख्याल करने वाला कोई नहीं है।'

मोहम्मद शमीम बीते ढाई महीने से लगातार कोरोना से मरने वालों को दफनाने का काम कर रहे हैं। इस दौरान उन्हें एक दिन की भी छुट्टी नहीं मिली है। वे बताते हैं, ‘शनिवार-रविवार तो छोड़िए, ईद के दिन भी मैंने तीन शव दफनाए हैं। इस दौरान कोई और ये काम करने को तैयार नहीं है इसलिए मुझे ही लगातार ये करना पड़ रहा है। लेकिन, इतना जोखिम लेने के बाद भी न तो हमारा कोई स्वास्थ्य बीमा हुआ है और न कोई जीवन बीमा।’

शमीम को चिंता है कि अगर वे संक्रमित हो जाते हैं तो उनके इलाज का खर्च कौन उठाएगा, उनकी चार बेटियों की जिम्मेदारी कौन उठाएगा।

शमीम को चिंता है कि ये काम करते हुए अगर वे ख़ुद संक्रमित हो जाते हैं तो उनके इलाज का खर्च कौन उठाएगा और अगर उन्हें कुछ हो जाता है तो उनकी चार बेटियां जो अभी स्कूल में हैं, उनकी जिम्मेदारी कौन उठाएगा। वे बताते हैं, ‘अपना कोरोना टेस्ट भी मैंने करीब 25 दिन पहले खुद से ही करवाया। इसके लिए 4500 रुपए अपनी जेब से दिए। यहां से मुझे एक शव के सिर्फ सौ रुपए मिलते थे। इससे ज्यादा तो ग्लव्ज, सैनिटाइजर आदि खरीदने में ही लग जाता है। मैंने ये बात समिति के सामने रखी तो बीते 25 मई से मुझे दिन के एक हजार रुपए मिलने लगे हैं। लेकिन इसी में से मुझे दो अन्य लोगों को भी पैसा देना होता है जो मेरे साथ यहां काम करते हैं।’

शमीम जो काम कर रहे हैं, उसकी गिनती कहीं भी ‘कोरोना वॉरियर’ वाले कामों में नहीं है। वे कहते हैं, ‘सब जगह इस दौरान काम करने वालों पर फूल बरसाए जा रहे हैं। लेकिन हम पर फूल बरसाना तो दूर हमारी मूलभूत जरूरत पूरी करने वाला भी कोई नहीं है। बिना एक दिन की भी छुट्टी लिए मैं लगातार इस गर्मी में काम कर रहा हूं। इस जंगल के अंदर पीने के पानी तक की सुविधा नहीं है।’

 शमीम बताते हैं कि अब तक हजारों मय्यत दफन कर चुके हैं लेकिन इससे पहले ये काम उनके लिए कभी इतना जोखिम भरा नहीं रहा।

शमीम मूलरूप से उत्तर प्रदेश के एटा के रहने वाले हैं। कई साल पहले उनके दादा दिल्ली आए थे और इस कब्रिस्तान में काम करना शुरू किया था। तब से यही उनका खानदानी काम बन गया जिसे शमीम बचपन से ही कर रहे हैं। वे बताते हैं कि अब तक वे हजारों मय्यत दफन कर चुके हैं लेकिन जिस तेजी से इन दिनों उन्हें ये करना पड़ रहा है, वो पहली ही बार है। साथ ही ये काम इतना जोखिम भरा भी आज से पहले उनके लिए कभी नहीं रहा।

शमीम कहते हैं, ‘यहां आने वाले कई लोग मुझसे कहते हैं कि मैं बहुत पुण्य का काम कर रहा हूं। मैं भी मानता हूं कि ये पुण्य का ही काम है। लेकिन, कोई ये भरोसा दिलाने वाला भी तो हो कि अगर ये पुण्य करते हुए मुझे कुछ हो जाता है तो मेरे इलाज या मेरे परिवार का ख्याल रखा जाएगा।

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बुंदेलखंड के तीन गांव / सैकड़ों किमी पैदल चलकर गांव पहुंची महिलाएं तो पैर में छाले थे, लेकिन यहां महिलाएं मर्दों के सामने चप्पलें नहीं पहनतीं

झांसी की बबीना तहसील के आदिवासी बहुल गांवों की महिलाएं मर्दों के सामने चप्पले नहीं पहनतीं।

  • गांव की 15 महिलाओं ने अनाज बैंक बनाया ताकि गांव में कोई भूखा ना सोए, अप्रैल से लेकर अब तक इसमें 11 क्विंटल गेहूं इकट्‌ठा हो गया है
  • सूखा झेलने वाले इन गांवों के लिए बकरी पालना आय का नया साधन बना, सामाजिक संगठन गांववालों को बकरियां मुहैया कराते हैं

धर्मेन्द्र सिंह भदौरिया

Jun 15, 2020, 05:56 AM IST

झांसी/ललितपुर. जब हम बुंदेलखंड पहुंचे तो हमें बेरोजगारी और गरीबी से जूझ रहे यहां के गांवों में अलग-अलग तस्वीर देखने को मिली। हमें खेमचंद मिले, जो सैकड़ों किमी पैदल चलकर अपने छोटे बच्चों के साथ शेरवास गांव आए थे। हमें सावित्री भी मिलीं, जो अपने 7 और 5 साल के बच्चे के साथ पैदल कडेसरा गांव पहुंची थी। हमें ललितपुर और झांसी जिले की बबीना तहसील के आदिवासी बहुल गांवों में तो एक अलग ही तस्वीर देखने को मिली। यहां सैकड़ों किमी दूर से आईं महिलाओं के पैरों के छाले सूखे भी नहीं थे कि गांव में आकर उन्हें बिना चप्पल के रहना पड़ा, क्योंकि ससुराल में मर्दों के सामने वे चप्पल नहीं पहन सकतीं।

ऐसे ही गांवों की तीन कहानियां -
कोई भूखा न सोए इसलिए महिलाओं ने बनाया अनाज बैंक

झांसी से करीब 60 किलोमीटर दूर झांसी-सागर फोर लेन हाईवे से दस किलो मीटर अंदर पतली सी सड़क जाती है और फिर आदिवासी बहुल टपरन/तिन्दरा गांव आता है। स्थानीय निवासी बताते हैं कि टपरे (झोपड़ी) नुमा घर होने के कारण गांव का नाम टपरन पड़ा, जिसे बाद में तिन्दरा कहा जाने लगा। गांव में 200 घर हैं इनमें ज्यादतर आदिवासी परिवारों के हैं।

छोटे, गरीब लेकिन मजबूत इरादों वाले इन गांववालों ने अनाज बैंक बनाने की एक पहल की है, ताकि गांव में कोई परिवार भूखा न सोए। खास बात यह है कि इस पहल की अगुवाई महिलाएं कर रही हैं। 52 साल की गोमा और 48 साल की बूदा ने 15 महिलाओं के साथ मिलकर इसे बनाया है। इस साल अप्रैल से लेकर अब तक इसमें 11 क्विंटल 60 किलो गेहूं इकट्‌ठा हो गया है।

हर परिवार अपने यहां होने वाली उपज का एक हिस्सा अनाज बैंक में रखता है और जरूरत पड़ने पर वह अनाज ले लेता है और फिर फसल आने पर बैंक में अनाज जमा कर देता है।

बैंक के बारे में गोमा बताती हैं, "इसमें हर परिवार अपने यहां होने वाली उपज का एक हिस्सा अनाज बैंक में रखता है और जरूरत पड़ने पर ले जाता है। फसल आने पर वह फिर से बैंक में अनाज जमा कर देता है। जरूरतमंद को गेहूं मिल जाता है। हम गांव के ही हैं, इसलिए हमें सभी के बारे में पता है, जो अनाज लौटाने की हालत में नहीं है उनसे हम अनाज वापस नहीं लेते हैं।

लाॅकडाउन में इंदौर में ईंट भट्‌टा पर काम कर रहे नौनेलाल जब गांव परिवार के साथ लौटे तो उनके पास खाने को कुछ नहीं था। ऐसे में उन्होंने यहीं से पांच पैली (पीतल का बर्तन, जिसमें 10 किलो अनाज आता है) गेहूं लिया। नौनेलाल बताते हैं कि सवा एकड़ जमीन के बीच वे चार भाई हैं। ईंट भट्‌टा पर काम कर छह लोगों का परिवार चलाते हैं। जब गांव लौटे तो खाने को कुछ नहीं था तब गोमा काकी से संपर्क किया और अनाज लिया।

घर में मर्द हैं तो ससुराल में चपल्लें नहीं पहनती आदिवासी महिलाएं
ललितपुर से करीब 40 किलो मीटर दूर छोटा सा गांव है हनौता। पत्थरों की बागड़ वाले दो कमरों के मकान (जिसमें एक जानवरों के लिए हैं) में रहती हैं 25 वर्षीय फूलबती। 20 दिन पहले ही इंदौर से लौटी हैं। ललितपुर से गांव तक का रास्ता पैदल ही तय किया है। वे अपने पति के साथ ईंट भट्‌टे पर काम करती थीं। 45 डिग्री से अधिक की चिलचिलाती दोपहर में खुले आसमान के नीचे फूलबती हमसे बातें कर रही थीं कि अचानक हमारी नजर उनके पैरों पर पड़ी। यह पूछने पर कि उन्होंने चप्पल क्यों नहीं पहनी? इस पर जवाब मिला, चप्पल तो है लेकिन ससुराल में गांव के मर्दों के आगे हम नहीं पहनते। यहां यही परंपरा है।

महिलाएं ससुराल में मर्दों के सामने चप्पल नहीं पहनती हैं। इस गांव की यही परंपरा है। फूलबती बताती हैं कि अब उन्हें बिना चप्पल रहने की आदत पड़ गई है। 

यह पूछने पर कि पैर नहीं जल रहे? तो वे कहती हैं कि अब तो आदत पड़ गई है। इस बीच गांव के 45 वर्षीय विक्रम बीच में ही कह पड़ते हैं कि मरदन की इज्जत करती हैं बाके मारे वे चप्पल नाईं पहरती। फूलबती ही नहीं 40 वर्षीय प्रेमबाई, 42 वर्षीय रती और गांव की अन्य महिलाएं भी हमें बिना चप्पलों के ही नजर आईं।

फूलबती के पास अभी रोजगार नहीं है क्योंकि कोरोना के कारण उन्हें गांव वापस आना पड़ा है। वे इस कुरीति को चुपचाप हंसकर निभा रहीं हैं। सामाजिक कार्यकर्ता दीक्षित बताते हैं कि ललितपुर जिले में और झांसी की बबीना तहसील के आदिवासी बहुल गांवों में यह कुरीति हमेशा से चली आ रही है।

प्रवासी मजदूरों के लिए रोजगार का जरिया बनीं बकरियां
ऐसे समय जब ग्रामीण क्षेत्रों में प्रवासी मजदूरों को रोजगार देने के सरकारी प्रयास छोटे साबित हो रहे हैं। गांव वाले अपने स्तर पर लोगों के लिए रोजगार के वैकल्पिक साधन मुहैया करवाने में जुटे हैं। ऐसा ही एक विकल्प बुंदेलखंड के हनौता गांव में आकार ले रहा है और उसका नाम है बकरी पालन।

गांव में लौटे प्रीतम के पास कोई रोजगार नहीं है। रोजगार के नाम पर उनकी पौने दो एकड़ जमीन है। वे कहते हैं कि बुंदेलखंड में लगातार सूखे के बाद खेती करना महंगा हो गया है और ज्यादा उपज हो नहीं पाती है। इसलिए ईंट भट्‌टा पर काम करने मध्यप्रदेश चले गए थे। जब आय का कोई साधन नहीं बचा तो मयंक करौलिया से संपर्क किया। मयंक ने उन्हें तीन बकरी मुहैया करवाईं।

प्रीतम बताते हैं, बकरी 14 महीने में दो बार बच्चे देती हैं। उनके बकरे बड़े होने के बाद 15 हजार रुपए तक बिक जाते हैं। एक साल में बकरे बेच कर 50 से 60 हजार रुपए की आमदनी हो जाती है। इनके चारे का खर्च भी ज्यादा नहीं है, पास में ही जंगल में चारा मिल जाता है।

परमार्थ समाजसेवी संगठन से जुड़े मयंक कहते हैं कि हमने अभी तक 20 गांव वालों को तीन-तीन बकरियां दी हैं। इनमें आठ प्रवासी मजदूर हैं। 15 से 18 हजार रुपए में तीन बकरियां पड़ जाती हैं जिनमें से एक बड़ी और दो छोटी-छोटी बकरियां हम ग्रामीणों को देते हैं। अगर सही ढंग से ग्रामीण बकरी पालन करें तो उन्हें गांव से बाहर नहीं जाना पड़ेगा।

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