भारत के तीन इलाकों पर नेपाल की दावेदारी

भारत के तीन इलाकों पर नेपाल की दावेदारी / नेपाल की संसद के ऊपरी सदन में भी नए नक्शे से जुड़ा बिल पास, अब बस राष्ट्रपति की मुहर लगना बाकी

  • निचले सदन में 14 जून को बिल पास हुआ था, चाहे प्रतिनिधि सभा हो या राष्ट्रीय सभा, एक भी सांसद ने इसका विरोध नहीं किया
  • नेपाल ने नया राजनीतिक नक्शा जारी किया है, इसे पास कराने के लिए ही यह बिल लाया गया था

दैनिक भास्कर

Jun 18, 2020, 08:19 PM IST

काठमांडू. भारत के तीन इलाकों कालापानी, लिम्पियाधुरा और लिपुलेख को अपना बताने के लिए नक्शे में बदलाव से जुड़ा बिल गुरुवार को नेपाल की राष्ट्रीय सभा यानी संसद के ऊपरी सदन से भी पास हो गया। वोटिंग में हिस्सा लेने वाले सभी 57 सांसदों ने इसका समर्थन किया।
चार दिन पहले 14 जून को यह बिल प्रतिनिधि सभा यानी नेपाली संसद के निचले सदन में भी बिना किसी विरोध के पास हो गया था। अब बस इस बिल को राष्ट्रपति के पास भेजने की औपचारिकता बाकी रह गई है।
नेपाल ने इस मुद्दे को राष्ट्रवाद से जोड़ा
निचले सदन में बिल पेश करने से पहले कुछ सांसदों ने इसके खिलाफ आवाज उठाई थी। इसकी वजह से एक बार बिल प्रतिनिधि सभा में पेश तो किया गया लेकिन पास नहीं हो सका। हालांकि, प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने इस मुद्दे को राष्ट्रवाद से जोड़ना शुरू कर दिया। यही वजह रही कि बाद में कुछ नेता जो इसके पक्ष में नहीं थे, वे भी साथ आ गए।
कुछ सांसदों ने इस मुद्दे पर चुप्पी साधना ही बेहतर समझा। ऐसे नेताओं ने ना तो इस बिल को सपोर्ट किया, न ही खुलकर इसके विरोध में आए। 275 सदस्यों वाली प्रतिनिधि सभा में बिल को 258 सांसदों का समर्थन मिला। बाकी सांसद सदन में पहुंचे ही नहीं। अगर राष्ट्रीय सभा की बात करें तो सत्तारुढ़ नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी के सांसदों की संख्या यहां ज्यादा है। ऐसे में पहले से ही इस बात की उम्मीद थी कि यहां बिल आसानी से पास हो जाएगा।
क्या रही बिल पेश करने की वजह
बीती 8 मई को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए यहां बनी एक सड़क का उद्घाटन किया था। यह सड़क धारचूला को लिपुलेख से जोड़ती है, जो कि कैलाश मानसरोवर जाने वाले यात्रियों का अहम पड़ाव है। यह सड़क बनने से कैलाश मानसरोवर की यात्रा एक हफ्ते में ही पूरी की जा सकती है जबकि पहले यह यात्रा तीन हफ्तों में होती थी।

दावा किया कि लिपुलेख नेपाल के हिस्से में पड़ता है। लिहाजा, सड़क निर्माण गलत है। इसमें नेपाल ने मार्च 1816 में हुई सुगौली संधि का भी जिक्र किया। नेपाल ने यह सड़क बनाने पर आपत्ति जताई। इसके बाद ही कालापानी को अपने देश का हिस्सा बताने वाला संविधान संशोधन बिल संसद में पेश किया। 

और जानने के लिए देखें यह वीडियो : 

सुगौली संधि में महाकाली नदी के आधार पर तय की गई है सीमा

सुगौली संधि में महाकाली नदी के आधार पर भारत नेपाल की सीमा बांटी गई है। यह नदी कई अलग-अलग धाराओं से मिलकर बनी है। ऐसे में इसके उद्गम स्थल को लेकर अलग-अलग मत हैं। नेपाल का दावा है महाकाली नदी की मुख्य धारा लिम्पियाधुरा से शुरू होती है। इसलिए इसे ही उद्गम स्थल माना जाएगा। उद्गम स्थल लिम्पियाधुरा है इसलिए लिम्पियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी नेपाल का हिस्सा हुआ।

भारत कहता है कि महाकाली नदी की सभी धाराएं कालापानी गांव में आकर मिलती है, इसलिए इसे ही नदी का उद्गम स्थल माना जाए। भारत ये भी कहता है कि सुगौली संधि में मुख्य धारा को नदी माना गया था। ऐसे में लिपुलेख को नेपाल का हिस्सा मानना गलत है।

भारत-नेपाल के बीच सीमा को लेकर सालों से विवाद

  • भारत और नेपाल के सीमाओं को लेकर सालों से विवाद चला आ रहा है। आजादी के बाद 1962 में भारत-चीन युद्ध के बाद भी नेपाल ने लिपुलेख पर दावा ठोंका था।
  • 1981 में दोनों देशों की सीमाएं तय करने के लिए एक संयुक्त दल बना था, जिसने 98% सीमा तय भी कर ली थी। सन् 2000 में नेपाल के प्रधानमंत्री गिरिजाप्रसाद कोइराला ने भारत के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से इस विवाद को बातचीत से सुलझाने का आग्रह भी किया था।
  • 2015 में जब भारत ने चीन के साथ लिपुलेख रास्ते से व्यापार मार्ग का समझौता किया था, तब भी नेपाल ने इस पर आपत्ति जताते हुए कहा था कि इस समझौते को करने से पहले भारत और चीन को उससे भी पूछना चाहिए था।

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